मेरा बढ़ना धीरे धीरे एक दिशा में एक मंज़र की तलाश में सफ़र में चलते हुए नदी में तैरते हुए पहाड़ चढ़ते हुए आख़िर दिखाई दिया अंतहीन आसमान।
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