आज चाँद आसमान में कुछ इतना भर है
जितनी मैं हूँ
तुम्हारे भीतर !
चाँद अमावस का
डर
डर को इतने करीब से देखना
ख़ौपनाख !
वो दो कदम
जो सरासर
बढ़ते मेरी ओर
मैं !
निश्हाय
बेबस
हताश
बैठ एक कोने में
देखती
उन क़दमों को
बढ़ते स्वम् की ओर !
एक हाथ बढ़ता है
मुझे नोंचने को
मेरी आह
चीख़
जिसे वो दूसरे हाथ से यूँ दबा डालता
मानो शोर में निकल रही हो तमाम चीखे
गुमनाम !
तुम्हारे साथ मन से थी
सरीर को कही दूर छोड़
किसी कोने में दफ़न कर
इस मांस के चीथड़े को
तुम्हारे संग हो जाती थी
लेकिन अब
केवल सरीर से हर जगह मजूद होती हूँ
मन तो रह गया कही
पीछे बहुत पीछे
कही छूट सा गया !
हवा की यह ठंडी फुहार
देखो तो
कैसे मेरे जिस्म पे
मेरी रूह को
वो ठंडा स्पर्श दे रही
जैसे पहली बार जब
तुमने मेरी आत्मा को छुआ था
पहली बार तुम्हारा स्पर्श पाकर मैंने
खुद को पवित्र किया था
मेरी रूह में वो ठंडक
आज भी बिलकुल उसी तरह से समाई है
जिस तरह वह शाख
जिस पर पत्ते तो नए आ गए है
लेकिन पुराने पत्ते जमीं पर बिखरे टूटे नहीं
बल्कि
अपना अस्तित्व बनाये हुए
इस ठंडी हवा संग नाच रहे है
अपने होने का आभास दे रहे हैं !
कितनी खूबसूरत होती है यह सुबह की पहली अजान
बिलकुल हमारे पहले मिलन की पहली शाम की तरह !
देखो न वो चाँद कैसे छुप रहा है
उस बादल की ओट में
बिलकुल मेरी तरह
जैसे मैं खुद को छुपाती थी
तुम्हरी ओट में
इस दुनिया से !