Monday, 31 October 2016

चाँद,अमावस का !

आज चाँद आसमान में कुछ इतना भर है
जितनी मैं हूँ
तुम्हारे भीतर !

चाँद अमावस का

Saturday, 8 October 2016

डर

                                 डर

डर को इतने करीब से देखना
ख़ौपनाख !
वो दो कदम
जो सरासर
बढ़ते मेरी ओर
मैं !
निश्हाय
बेबस
हताश
बैठ एक कोने में
देखती
उन क़दमों को
बढ़ते स्वम् की ओर !
एक हाथ बढ़ता है
मुझे नोंचने को
मेरी आह
चीख़
जिसे वो दूसरे हाथ से यूँ दबा डालता
मानो शोर में निकल रही हो तमाम चीखे
गुमनाम !

Saturday, 1 October 2016

तुम्हारे साथ !

तुम्हारे साथ मन से थी
सरीर को कही दूर छोड़
किसी कोने में दफ़न कर
इस मांस के चीथड़े को
तुम्हारे संग हो जाती थी
लेकिन अब
केवल सरीर से हर जगह मजूद होती हूँ
मन तो रह गया कही
पीछे बहुत पीछे
कही छूट सा गया !

Tuesday, 30 August 2016

तुम्हारी लौ

आओ तो
जरा ये रोशनी को बुझा जाओ
जो तुम जला कर चले गए
जिसकी लौ बुझी नहीं
अभी तक !

अस्तित्व

हवा की यह ठंडी फुहार
देखो तो
कैसे मेरे जिस्म पे
मेरी रूह को
वो ठंडा स्पर्श दे रही
जैसे पहली बार जब
तुमने मेरी आत्मा को छुआ था
पहली बार तुम्हारा स्पर्श पाकर मैंने
खुद को पवित्र किया था
मेरी रूह में वो ठंडक
आज भी बिलकुल उसी तरह से समाई है
जिस तरह वह शाख
जिस पर पत्ते तो नए आ गए है
लेकिन पुराने पत्ते जमीं पर बिखरे टूटे नहीं
बल्कि
अपना अस्तित्व बनाये हुए
इस ठंडी हवा संग नाच रहे है
अपने होने का आभास दे रहे हैं !

वो पहली अज़ान !


कितनी खूबसूरत होती है यह सुबह की पहली अजान
बिलकुल हमारे पहले मिलन की पहली शाम की तरह !

तुम्हारी ओट !

देखो न वो चाँद कैसे छुप रहा है
उस बादल की ओट में
बिलकुल मेरी तरह
जैसे मैं खुद को छुपाती थी
तुम्हरी ओट में
इस दुनिया से !