Wednesday, 25 May 2022
तेरा तुझ को अर्पण
नदी का समुंदर से मिलन...
Friday, 28 January 2022
जहाँ से तुमको विदा किया...
Monday, 8 October 2018
उस मोड़ से आगे
कितना आगे बढ़ गए तुम
उस मोड़ से
जहाँ मुझे छोड़ के चल पड़े थे
तुम तो आगे बढ़ने के लिए चले थे वहाँ से
लेकिन किसी को यूँ बीच राह में छोड़
क्या कभी पैर कापें नहीं
उसके पैरों को जाम देख कर
जो आज भी सदियों से वही जाम है
जस के तस !
उस मोड़ से आगे तुम बहुत दूर चले गए
और बीच राह में रह गयी 'मैं'
अकेले खड़े !
Thursday, 30 August 2018
तुम क्या हो...
तुम क्या हो...
कभी सोचा क्या हो तुम ?
तुम्हारी जगह कहाँ है ?
किसी के दिल में !
नहीं...
नही हो तुम किसी के दिल मे !
तुम एक जरूरत मात्र हो !
कैसी जरूरत...?
मैं बताती हूँ ...
तुम्हारा सरीर
तुमको पता है
यह तुम्हारे लिए एक अभिशाप बन गया है...
जो देखता है वो एक पेड़ की तरह देखता है
वो उस पेड़ से बहुत चीज़े बना सकता है
कुर्सी
टेबल
बेड...
और भी सारी इस्तेमाल की चीज़ें !
लेकिन वो कभी यह नहीं सोचता
कि इस पेड़ की...
डाली है
टहनी है
इस पर पत्ते है
इसमे फल है,भविष्य में और आएंगे
हर रोज़ यह पेड़ जाने किस किस को तपती धूप में
शीतल छाह देता है !
तुमको एक इस्तेमाल की चीज़ समझ
हर रोज़ फेक दिया जाता है !
फिर तुम खुद से सवाल करती हो
क्या हूँ मैं ?
कहाँ हूँ मैं ?