Monday, 20 June 2022

खुशियों की जमीन

अपनी खुशियों की जमीन पर
मैं तुम्हारी मुस्कुराहट के बीज बोउंगी !

Monday, 6 June 2022

दो - राहें

उस मोड़ पर तुम मिले,
जिस से आगे
हम दोनों की राहें जुदा थी !
                                 -  ऋतु

Wednesday, 25 May 2022

तेरा तुझ को अर्पण


तुमको कुछ दे पाऊं 
वो 'कुछ' मेरे पास नहीं 
सिवाय मेरी साँसों के जो सिर्फ मेरी हैं
ऐसा कुछ जो सिर्फ मेरा है,
उसके सिवाय 
तुमको कुछ दे पाऊं
वो 'कुछ' मेरे पास नहीं

 .....सिवाय....

मेरा वक्त जो सिर्फ मेरा, मेरे हर पल में है,
मेरी उम्र, जो मेरे जीवन में है,
मेरा जीवन, जो तुम्हारी साँसों में है,
मेरी धकड़ने, जो मेरे हृदय में हैं,
मेरा हृदय,जो मेरे शरीर में है,
मेरी मुस्कुराहट, जो मेरे होंठो में है,
मेरे चेहरे का नूर, जो तुम्हारे चेहरे में है,
मेरा लहू, जो मेरी रगों में
मेरी आत्मा, जो मेरी रूह में है,
मेरी खूबसूरती, जो मेरी आँखों में है,
मेरी किस्मत, जो मेरे हाथ की लकीरों में है
मेरी ऊँचाई, जो मेरे कदमों में है
मेरा परिश्रम, जो मेरे संघर्ष में है
मेरी प्रार्थनाएं, जो ईश्वर से हर क्षण मैंने की
मेरी दुवाएं, जो मैंने हर दुःख-सुख में माँगी
मेरी पवित्रता, जो मेरी सच्चाई में है
मेरा घमण्ड/गुरुर, जो मेरे आत्मसम्मान में है,
मेरा मुझ में जो है, वो सब तुम्हारा !

और, साथ ही साथ...

मेरी कमजोरी, जो सिर्फ तुम में है...
मेरी बेचैनी, जो तुमको खोने में है...
मेरी ताकत, जो सिर्फ तुम हो...
मेरी जीवन भर की खुशी, जो तुमको पाने में है,
मेरी पहचान, जो तुम से होगी,

मेरा 'सब' तुमको उपहार...






मैंने अपने भीतर 
 तुम्हारे प्रेम को बचाये रखा
और उसने इस दुनिया की
सारी कड़वाहटों को मिटा
 इस दुनिया को
मुझ में बचाए रखा।

नदी का समुंदर से मिलन...

मैं नदी बनना चाहती हूँ,
ताकि मुझे समुंदर नसीब हो।
जो पहाड़ो और मैदानों के सफर से थक जाऊं,
तब बाहें फैलाए
आगे समुंदर मेरा इंतजार करता मिले,
और मैं उसी में समा कर समुंदर हो जाऊं।

Friday, 28 January 2022

जहाँ से तुमको विदा किया...

तुम चले गए बहुत दूर कहीं
लेकिन...
मैं आज भी वही हूँ
जहाँ से तुम्हें विदा किया !

जाओ

जाना ही है तो पूरे जाओ,
यूँ  आधे-अधूरे  मेरे भीतर रह कर नहीं!

Monday, 8 October 2018

उस मोड़ से आगे

कितना आगे बढ़ गए तुम
उस मोड़ से
जहाँ मुझे छोड़ के चल पड़े थे
तुम तो आगे बढ़ने के लिए चले थे वहाँ से
लेकिन किसी को यूँ बीच राह में छोड़
क्या कभी पैर कापें नहीं
उसके पैरों को जाम देख कर
जो आज भी सदियों से वही जाम है
जस के तस !
उस मोड़ से आगे तुम बहुत दूर चले गए
और बीच राह में रह गयी 'मैं'
अकेले खड़े !

Thursday, 30 August 2018

तुम क्या हो...

तुम क्या हो...

कभी सोचा क्या हो तुम ?
तुम्हारी जगह कहाँ है ?
किसी के दिल में !
नहीं...
नही हो तुम किसी के दिल मे !
तुम एक जरूरत मात्र हो !
कैसी जरूरत...?
मैं बताती हूँ ...
तुम्हारा सरीर
तुमको पता है
यह तुम्हारे लिए एक अभिशाप बन गया है...
जो देखता है वो एक पेड़ की तरह देखता है
वो उस पेड़ से बहुत चीज़े बना सकता है
कुर्सी
टेबल
बेड...
और भी सारी इस्तेमाल की चीज़ें !
लेकिन वो कभी यह नहीं सोचता
कि इस पेड़ की...
डाली है
टहनी है
इस पर पत्ते है
इसमे फल है,भविष्य में और आएंगे
हर रोज़ यह पेड़ जाने किस किस को तपती धूप में
शीतल छाह देता है !
तुमको एक इस्तेमाल की चीज़ समझ
हर रोज़ फेक दिया जाता है !
फिर तुम खुद से सवाल करती हो
क्या हूँ मैं ?
कहाँ हूँ मैं ?

Sunday, 12 August 2018

पापा...

                            
वो कभी मुझे मेरी जिम्मेदारियां नहीं बताते,
लेकिन...
जब एक नज़र भर,
वो उम्मीद भरी आंखें मेरी ओर तकती है,
ख़ुद-ब-खुद बयां हो जाते हैं
वो सपने...
जिनके चित्र उन नम आंखों में तैर रहें !
वो कभी कमजोर नहीं पड़ते !
लेकिन
पैरों का यूँ लड़खड़ाना
बयां करता है जीवन भर का वो सफ़र...
जिसे बिना रुके तय करते आएं
कभी नहीं आने देते चेहरे पर थकान
लेकिन
माथे पर लेटी
वो बलें
बयां करती है...
हर वह त्याग,
जो औरों की खुशी के लिए किया !

Sunday, 18 February 2018

'शुक्रिया'

      'शुक्रिया'
जब जब मुझे तुम याद आते हो
तब तब मुझे किसी से प्यार हो जाता है
जब कभी कोई प्यार से पुकारता है मुझे
याद आता है तब तेरा तेज मुझ पर झल्लाना
एक पल के लिए जब कोई छूता भर है
याद आता है तेरा मुझ पर हाथ उठाना
हरेक बात पर मेरी परवाह
याद दिलाती है हर पल की तेरी लापरवाही मेरे लिए
जहान में सबसे अनमोल बना डालना किसी का
तब याद आता है तेरा उपेक्षित समझ दूर छिटकना
हर वक़्त हर पल सामने साये की तरह किसी की मज़ूदगी,
याद दिलाता है तेरे लिए अंतहीन इंतज़ार !
तेरी हर गलती,हर रुसवाई,हर वक़्त का वो प्यार
और जाने क्या क्या.....सब
मुझे किसी से भी प्यार करने को धकेलती हैं !

Friday, 16 February 2018

'नाम'

     
कई दिनों बाद,
आज फिर मुझे  किसी ने पुकारा
अक्सर तुम्हारे बाद,
अब मुझे,
सब 'बुलाते' हैं वरना !

Tuesday, 9 January 2018

तेरा स्पर्श

तुम्हारा स्पर्श पाते ही
मैं सिमट गयी
जैसे,
झरना सिमट जाता है नदी में।
और तुम फ़ैल गये पहाड़ से,
मुझे खुद में लिपटा के।

Monday, 25 December 2017

बदलना

जानते हो....!
उस पहाड़ी नदी से जब इस बार अकेली गुजरी तो क्या बोली वो मुझ से
वो कहा है जिसके संग घण्टो बैठी रहती
मुझ पर पैर डाले !
मैं मौन वहाँ से गुजर गई
थोड़ी आगे बढ़ी ही थी कि
सरसो मेरे कदमों मे लिपटते हुए
इठलाती हुए बोली
इस बार नहीं सजाओगी मुझे अपनी जुल्फों में !
और वो ऊँचे ऊँचे चीड़
वो तो झुक के नीचे आगये
कि,अब तो झूला डाल लो
तब तुमको तंग करते और भी ऊँचे हो जाया करते
वो पहाड़ की चढ़ाई...
बड़ी मायूस होकर मुझ से बोली
कहाँ है वो
जो अपनी पीठ पर बिठा के तुमको मुझ से पार करवाता था !
वो बुरांश वो तो मुझ पर बरसे ही जा रहे थे
कि, अब तो तोड़ लो हमें डाली से !
देखो ना सब कुछ तो बदल रहा था
मेरे लिए...
सिवाय तुम्हारे
मेरे लिए...

Tuesday, 29 August 2017

आज फिर.....

तुम्हारी याद कितनी ख़ूबसूरत होती है
बिलकुल जैसे-
पहाड़ो पर ढलते सूरज की लालिमा
जो,कुछ ही क्षण के लिए ही
उन पहाड़ो की सूखी चोटियों को
जान दे जाती है
जो अरसे से बेजान पड़ी हुई हैं
................

Sunday, 2 July 2017

जाओ...

जा रहे हो,
तो
पुरे जाना
आधा मेरे भीतर रहकर नहीं...

Sunday, 7 May 2017

मैं लौटूंगी !

मैं लौटूंगी तुम्हारे पास...!
वो नन्हा फूल बनकर,
जो हर रोज़ तुम्हारे आँगन में खिलेगा,
अपनी खुसबू से सबको महका देगा !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास वो नन्हा पौधा बनकर,
जो हर पल तुमको ठंडी छाँह देगा !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
तुम्हारी नन्ही बेटी बनकर,
जिसकी किलकारियों से तुम्हारा आँगन गूँज उठेगा !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
वो नन्हा तारा बनकर,
जो तुम्हारी हर दुआ पूरी करने टूट जाया करेगा !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
बारिश की वो पहली बूंद बनकर,
जो तुम्हारी रूह को भिगो देगी !
और तुम पर जी भर के बरस जाउंगी !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
सूरज की पहली किरण बनकर,
और तुम्हारे जीवन में उजाले भर दूंगी !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
हर उस रूप में,
जो तुम्हें जीने की वज़ह देगा !
हर युग,
हर जन्म,
तुम्हारे लिए... सिर्फ तुम्हारे लिए !

Saturday, 25 February 2017

सफ़ेद चादर !

सफ़ेद चादर सांझ हो चली थी और ठंड बढ़ती ही जा रही थी ! पहाड़ों से सूरज कुछ यूँ ढल रहा था मानो क्षण भर के लिए वो पहाड़ की सूखी चोटियों में जान भर रहा हो जो एक अरसे से बेजान पड़ी हुई है,कुछ यूँ उस ढलते सूरज की लालिमा प्रतीत हो रही थी। नीलिमा,निहाल के काँधे पर सर टिकाये एकटक उस ढलते सूरज को देखती और निहाल उसे निहारता ! लगता है आज बहुत तेज बरसात होने वाली है !देखो आसमान कैसे धुंधला गया ! निहाल कहता है। लेकिन नीलिमा अभी भी एकटक उस ढलते सूरज को निहारते हुए खुद को निहाल में समेटे हुए थी,कुछ इस तरह जैसे अमावस की रात को वो अधूरा चाँद खुद को छिपाता है बादलों की ओट में। आज रात का सारा खाना मैं बनाऊंगा और तुम मुझे देखते रहना,हो सकता है फिर कभी तुमको मेरे हाथ का खाना खाने का मौका मिले न मिले ! निहाल के इस एक वाक्य ने नीलिमा को बेचैन कर दिया,वो घबरा गयी, आखिर ऐसा क्यों कहा उसने,क्यों नहीं वो मिलेंगे,क्यों नहीं भला उसे निहाल के हाथ का कहना खाने का मौका मिलेगा ! वो दोनों तो एक दूसरे के जीवन संगी है,यही कहता है न निहाल उसे हमेशा !फिर ऐसा क्यों कहा उसने ! ये सारी ही बातें एकाएक नीलिमा के ज़हन में घूमने लगी। मुझे बहुत ठंड लग रही है मैं जाती हूँ सोने,भूख भी नहीं है,तुम खाना खा लेना !नीलिमा अपनी दबी सी आवाज़ में कहते हुए चली गयी।सोने की हज़ार कोशिशें करते करते असफल हो जाती है।आज उसे निहाल के साथ वो खूबसूरत ख्वाब भी नहीं आरहे जिन्हें नीलिमा नींद न आने पे अक्सर देखा करती है। बहुत देर हो गयी,नीलिमा को सहसा याद आता है कि निहाल भी है वहाँ, वह अभी तक आया क्यों नहीं ?कहा गया आख़िर वह ! नीलिमा अचानक ही नंगे पॉव दौड़ी चली जाती है निहाल के पास।इतने में निहाल को सामने खड़ा पाकर उसे थोड़ा चैन मिला और निहाल से लिपट जाती है,उसे अपनी बाहों में इस तरह बाध देती है कि निहाल चाहकर भी खुद को छुड़ा न पाए। बहुत रात हो चुकी है,ठंड भी बहुत है तुम बीमार पड़ जाओगी !अब सो जाओ ! निहाल,नीलिमा को अपनी गोद में उठाकर कमरे में लाते हुए कहता है। निहाल के इस स्पर्श मात्र से नीलिमा का रोम-रोम खिल उठा और उसका सरीर चूर-चूर होकर बिखर गया जिसे वह चाहकर भी समेटना नहीं चाहती थी !उसने खुद को पूरी तरह से निहाल को सौप दिया। यह अहसास उसके लिए एकदम नया था,अब से पहले कभी उसको किसी ने छुवा नहीं था ।आज निहाल का यह स्पर्श उसे पूरी तरह पिघला रहा था मोम की भांति ! उस बर्फ़ की तरह जो पहाड़ों में सदियों से जमी रहती है लेकिन धूप के एक टुकड़े के छू जाने मात्र से पिघल कर पानी-पानी होकर जमीन में बह जाता है अपनी झरनों के लिए ! खिड़कियों से झांकती हुयी सूरज की किरणें धीरे धीरे नीलिमा के चेहरे पर पड़ रही थी,सहसा उसकी आँखें खुली और नज़र सामने टंगी दीवार पे जा टिकी,समय देखा तो साड़े आठ बज चुके थे। अचानक पीछे से आवाज सुनाई देती है ! "एक काम करो उठकर जल्दी अपना सामान बांधो और चली जाओ यहाँ से" एक पल के लिए नीलिमा आँखे बंद कर नींद में दोबारा जाने की कोशिश करती है ! शायद यह कोई बुरा सपना था !जिस आवाज को वह पहचान भी नहीं पाई थी ! अचानक वह पीछे मुड़कर देखती है तो पति है कि निहाल तैयार होकर अपना सारा सामान पैक कर चुका है और जाने को तैयार खड़ा है। सारे कमरे में नीलिमा का समंबस्ट व्यस्त बिखरा हुआ था जैसे कि इस्तेमाल की गयी चीज़ों को फेक दिया जाता है ! क्या हुआ निहाल,तुम ऐसा क्यों बोल रहे हो,आखिर ऐसा कर क्यों रहे हो ! नीलिमा दरी सहमी सी निहाल से लगातार प्रश्न करती है लेकिन निहाल कोई उत्तर नहीं देता। इस अंजान शहर में निहाल के सिवाय उसका और है ही कौन ! कहा जयेगी वह ! नीलिमा को भीतर ही भीतर यही चिंता खाये जा रही थी। उस से भी अधिक इस बात का डर आखिर निहाल के इस बदले हुए व्यवहार का कारण क्या है ? क्या हुआ कल रात ऐसा ? अनगिनत सवाल नीलिमा के ज़ेहन में कूद फांद कर रहे थे। इतने में ही एकाएक नीलिमा की नज़र उस चादर पर जा टिकी जिस पर वह कल रात सोई थी,'जो सफेफ थी' कोरी 'सफ़ेद चादर'.....

Thursday, 9 February 2017

एक अंतहीन दिशा में !

मेरा बढ़ना धीरे धीरे
एक दिशा में
एक मंज़र की तलाश में
सफ़र में चलते हुए
नदी में तैरते हुए
पहाड़ चढ़ते हुए
आख़िर दिखाई दिया
अंतहीन आसमान।

Monday, 28 November 2016

एक नदी सी में !

पहाड़ की तलछटों में बहती एक नदी हूँ मैं,
और तुम,
उन तलछटों में बहते,
ऊँचे पर्वतों से गिरते हुए झरनें।
जिसे नदी अंततः खुद में ही समाहित कर लेती है।