Monday, 20 June 2022
Monday, 6 June 2022
Wednesday, 25 May 2022
तेरा तुझ को अर्पण
नदी का समुंदर से मिलन...
Friday, 28 January 2022
जहाँ से तुमको विदा किया...
Monday, 8 October 2018
उस मोड़ से आगे
कितना आगे बढ़ गए तुम
उस मोड़ से
जहाँ मुझे छोड़ के चल पड़े थे
तुम तो आगे बढ़ने के लिए चले थे वहाँ से
लेकिन किसी को यूँ बीच राह में छोड़
क्या कभी पैर कापें नहीं
उसके पैरों को जाम देख कर
जो आज भी सदियों से वही जाम है
जस के तस !
उस मोड़ से आगे तुम बहुत दूर चले गए
और बीच राह में रह गयी 'मैं'
अकेले खड़े !
Thursday, 30 August 2018
तुम क्या हो...
तुम क्या हो...
कभी सोचा क्या हो तुम ?
तुम्हारी जगह कहाँ है ?
किसी के दिल में !
नहीं...
नही हो तुम किसी के दिल मे !
तुम एक जरूरत मात्र हो !
कैसी जरूरत...?
मैं बताती हूँ ...
तुम्हारा सरीर
तुमको पता है
यह तुम्हारे लिए एक अभिशाप बन गया है...
जो देखता है वो एक पेड़ की तरह देखता है
वो उस पेड़ से बहुत चीज़े बना सकता है
कुर्सी
टेबल
बेड...
और भी सारी इस्तेमाल की चीज़ें !
लेकिन वो कभी यह नहीं सोचता
कि इस पेड़ की...
डाली है
टहनी है
इस पर पत्ते है
इसमे फल है,भविष्य में और आएंगे
हर रोज़ यह पेड़ जाने किस किस को तपती धूप में
शीतल छाह देता है !
तुमको एक इस्तेमाल की चीज़ समझ
हर रोज़ फेक दिया जाता है !
फिर तुम खुद से सवाल करती हो
क्या हूँ मैं ?
कहाँ हूँ मैं ?
Sunday, 12 August 2018
पापा...
वो कभी मुझे मेरी जिम्मेदारियां नहीं बताते,
लेकिन...
जब एक नज़र भर,
वो उम्मीद भरी आंखें मेरी ओर तकती है,
ख़ुद-ब-खुद बयां हो जाते हैं
वो सपने...
जिनके चित्र उन नम आंखों में तैर रहें !
वो कभी कमजोर नहीं पड़ते !
लेकिन
पैरों का यूँ लड़खड़ाना
बयां करता है जीवन भर का वो सफ़र...
जिसे बिना रुके तय करते आएं
कभी नहीं आने देते चेहरे पर थकान
लेकिन
माथे पर लेटी
वो बलें
बयां करती है...
हर वह त्याग,
जो औरों की खुशी के लिए किया !
Sunday, 18 February 2018
'शुक्रिया'
'शुक्रिया'
जब जब मुझे तुम याद आते हो
तब तब मुझे किसी से प्यार हो जाता है
जब कभी कोई प्यार से पुकारता है मुझे
याद आता है तब तेरा तेज मुझ पर झल्लाना
एक पल के लिए जब कोई छूता भर है
याद आता है तेरा मुझ पर हाथ उठाना
हरेक बात पर मेरी परवाह
याद दिलाती है हर पल की तेरी लापरवाही मेरे लिए
जहान में सबसे अनमोल बना डालना किसी का
तब याद आता है तेरा उपेक्षित समझ दूर छिटकना
हर वक़्त हर पल सामने साये की तरह किसी की मज़ूदगी,
याद दिलाता है तेरे लिए अंतहीन इंतज़ार !
तेरी हर गलती,हर रुसवाई,हर वक़्त का वो प्यार
और जाने क्या क्या.....सब
मुझे किसी से भी प्यार करने को धकेलती हैं !
Friday, 16 February 2018
Tuesday, 9 January 2018
तेरा स्पर्श
तुम्हारा स्पर्श पाते ही
मैं सिमट गयी
जैसे,
झरना सिमट जाता है नदी में।
और तुम फ़ैल गये पहाड़ से,
मुझे खुद में लिपटा के।
Monday, 25 December 2017
बदलना
जानते हो....!
उस पहाड़ी नदी से जब इस बार अकेली गुजरी तो क्या बोली वो मुझ से
वो कहा है जिसके संग घण्टो बैठी रहती
मुझ पर पैर डाले !
मैं मौन वहाँ से गुजर गई
थोड़ी आगे बढ़ी ही थी कि
सरसो मेरे कदमों मे लिपटते हुए
इठलाती हुए बोली
इस बार नहीं सजाओगी मुझे अपनी जुल्फों में !
और वो ऊँचे ऊँचे चीड़
वो तो झुक के नीचे आगये
कि,अब तो झूला डाल लो
तब तुमको तंग करते और भी ऊँचे हो जाया करते
वो पहाड़ की चढ़ाई...
बड़ी मायूस होकर मुझ से बोली
कहाँ है वो
जो अपनी पीठ पर बिठा के तुमको मुझ से पार करवाता था !
वो बुरांश वो तो मुझ पर बरसे ही जा रहे थे
कि, अब तो तोड़ लो हमें डाली से !
देखो ना सब कुछ तो बदल रहा था
मेरे लिए...
सिवाय तुम्हारे
मेरे लिए...
Tuesday, 29 August 2017
आज फिर.....
तुम्हारी याद कितनी ख़ूबसूरत होती है
बिलकुल जैसे-
पहाड़ो पर ढलते सूरज की लालिमा
जो,कुछ ही क्षण के लिए ही
उन पहाड़ो की सूखी चोटियों को
जान दे जाती है
जो अरसे से बेजान पड़ी हुई हैं
................
Sunday, 2 July 2017
Sunday, 7 May 2017
मैं लौटूंगी !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास...!
वो नन्हा फूल बनकर,
जो हर रोज़ तुम्हारे आँगन में खिलेगा,
अपनी खुसबू से सबको महका देगा !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास वो नन्हा पौधा बनकर,
जो हर पल तुमको ठंडी छाँह देगा !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
तुम्हारी नन्ही बेटी बनकर,
जिसकी किलकारियों से तुम्हारा आँगन गूँज उठेगा !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
वो नन्हा तारा बनकर,
जो तुम्हारी हर दुआ पूरी करने टूट जाया करेगा !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
बारिश की वो पहली बूंद बनकर,
जो तुम्हारी रूह को भिगो देगी !
और तुम पर जी भर के बरस जाउंगी !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
सूरज की पहली किरण बनकर,
और तुम्हारे जीवन में उजाले भर दूंगी !
मैं लौटूंगी तुम्हारे पास,
हर उस रूप में,
जो तुम्हें जीने की वज़ह देगा !
हर युग,
हर जन्म,
तुम्हारे लिए... सिर्फ तुम्हारे लिए !
Saturday, 25 February 2017
सफ़ेद चादर !
Thursday, 9 February 2017
एक अंतहीन दिशा में !
मेरा बढ़ना धीरे धीरे
एक दिशा में
एक मंज़र की तलाश में
सफ़र में चलते हुए
नदी में तैरते हुए
पहाड़ चढ़ते हुए
आख़िर दिखाई दिया
अंतहीन आसमान।
Monday, 28 November 2016
एक नदी सी में !
पहाड़ की तलछटों में बहती एक नदी हूँ मैं,
और तुम,
उन तलछटों में बहते,
ऊँचे पर्वतों से गिरते हुए झरनें।
जिसे नदी अंततः खुद में ही समाहित कर लेती है।